अमेरिका-इजरायल ने धोखे से खामेनेई को मार डाला! दो महीने पहले बन गया था प्लान, शनिवार को ही क्यों हुआ हमला

खामेनेई पर हमला अचानक नहीं था. अमेरिका और इजरायल दो महीने से बातचीत के साथ-साथ सैन्य तैयारी कर रहे थे. आखिरी समय तक ईरान को लगा कि समझौता होगा, लेकिन तय दिन पर एक साथ कई ठिकानों पर हमला किया गया. रिपोर्ट के मुताबिक खामेनेई बैठक में थे और उन्हें मौका नहीं मिला. यह कार्रवाई मिडिल ईस्ट के हालात पूरी तरह बदल सकती है.

अमेरिका और इजरायल की ओर से किए गए हमले में ईरानी सुप्रीम लीडर अयातुल्ला अली खामेनेई की मौत हो गई. ईरान पर हुए हमले को लेकर अब जो जानकारी सामने आ रही है, उससे साफ हो रहा है कि खामेनेई को अचानक या गलती से निशाना नहीं बनाया गया है. अमेरिका और इजरायल पिछले करीब दो महीने से एक साथ दो रास्तों पर काम कर रहे थे. एक तरफ ईरान से बातचीत चल रही थी, दूसरी तरफ चुपचाप बड़े सैन्य हमले की तैयारी हो रही थी. एक्सियोस की रिपोर्ट के मुताबिक शनिवार सुबह जब तेहरान में खामेनेई अपने सरकारी परिसर में सलाहकारों के साथ बैठक कर रहे थे, उसी समय उन पर हमला किया गया. कहा जा रहा है कि उन्हें अंदाजा तक नहीं था कि इतनी बड़ी कार्रवाई होने वाली है. यही वजह है कि इस ऑपरेशन को अब तक की सबसे बड़ी और सबसे गुप्त सैन्य कार्रवाई माना जा रहा है.

शनिवार को जो हुआ वह अचानक नहीं किया गया. इस पूरे घटनाक्रम की शुरुआत दिसंबर के आखिर में हुई, जब ईरान में सरकार के खिलाफ बड़े पैमाने पर प्रदर्शन शुरू हुए. महंगाई, बेरोजगारी और सख्त नियमों से परेशान लोग सड़कों पर उतर आए. हालात इतने बिगड़े कि सरकार ने सख्ती की और हजारों लोगों के मारे जाने की खबरें आईं. इसी दौरान इजरायल के प्रधानमंत्री नेतन्याहू अमेरिका गए और डोनाल्ड ट्रंप से मुलाकात की. उस समय दोनों नेताओं के बीच ईरान पर आगे की रणनीति को लेकर बात हुई. शुरुआत में योजना सिर्फ मिसाइल और सैन्य ठिकानों को निशाना बनाने की थी, लेकिन ईरान में बढ़ते विरोध और तनाव ने इस योजना को बदल दिया.

जब ईरान में प्रदर्शन तेज हुए तो ट्रंप ने खुलकर प्रदर्शनकारियों का समर्थन किया. उन्होंने सोशल मीडिया पर लिखा कि मदद रास्ते में है और लोगों से सरकारी संस्थानों पर कब्जा करने को कहा. इस बयान से साफ हो गया था कि अमेरिका सिर्फ बातचीत के भरोसे नहीं बैठा है. जनवरी के बीच में खबर आई कि अमेरिका हमला करने वाला है, लेकिन आखिरी समय पर फैसला रोक दिया गया. इसके बाद मिडिल ईस्ट में अमेरिकी सेना की मौजूदगी बढ़ा दी गई और इजरायल के साथ मिलकर गुप्त योजना बनाई जाने लगी.

इसी दौरान अमेरिका और ईरान के बीच बातचीत भी चलती रही. ओमान और फिर जेनेवा में बैठक हुई. अमेरिका चाहता था कि ईरान अपना परमाणु कार्यक्रम सीमित करे, मिसाइल पर बात करे और क्षेत्र में सक्रिय लड़ाकों को समर्थन देना बंद करे. लेकिन अमेरिकी अधिकारियों के मुताबिक ईरान ने इन मुद्दों पर साफ जवाब नहीं दिया. उन्हें लगा कि ईरान सिर्फ समय बर्बाद कर रहा है और पीछे से अपनी तैयारी कर रहा है.

 

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