देश के सार्वजनिक क्षेत्र की महारत्न कंपनी “सेल” के बोकारो स्टील प्लांट में संविदा कर्मचारियों की 40% कटौती के

देश के सार्वजनिक क्षेत्र की महारत्न कंपनी “सेल” के बोकारो स्टील प्लांट में संविदा कर्मचारियों की 40% कटौती के

खिलाफ भारतीय मजदूर संघ (BMS) – सुरेन्द्र कुमार पांडेय

भारतीय मजदूर संघ के महामंत्री सुरेन्द्र कुमार पांडे ने इस्पात महासंघ (बीएमएस) के महामंत्री रंजय कुमार के पत्र का हवाला देते हुये बोकारो स्टील प्लांट (BSL) और एस.आर.यू (SRU) इकाइयों में संविदा कर्मियों की संख्या में 40% की भारी कटौती करने के सेल प्रबंधन के हालिया फैसले पर कड़ा विरोध दर्ज कराया है। संघ ने इसे एक ‘कठोर और अदूरदर्शी’ कदम बताते हुए इस्पात मंत्रालय एवं सेल प्रबंधन के ऊंच्च अधिकारी को पत्र द्वारा सूचित किया है।

 

भारतीय मजदूर संघ ने इस कटौती के विरुद्ध आपत्तियों को रेखांकित करते हुये स्पष्ट किया कि मजदूरों से संबन्धित किसी भी आदेश या नीतिगत बदलाव को ट्रेड यूनियन के साथ चर्चा किए बिना प्रसारित करना उन हजारों श्रमिकों के बीच भय एवं असुरक्षा का माहौल पैदा करता है। लगभग 3,335 श्रमिकों (BSL से 2,552 और SRU से 783) की व्यापक छंटनी राज्य के नीति-निर्देशक सिद्धांतों एवं भारत के संविधान के अनुच्छेद 41 (काम का अधिकार) के विपरीत है।

 

ये श्रमिक अक्सर स्थानीय या विस्थापित परिवारों से होते हैं। आय का अचानक समाप्त होना बोकारो क्षेत्र में स्थानीय आर्थिक मंदी और सामाजिक अशांति का कारण बनेगा। प्रबंधन द्वारा यह कहना की संविदाकर्मियों की कमी की जा रही है या की जाएगी, यह “सामूहिक छंटनी” की श्रेणी में आता है जो ‘औ‌द्योगिक विवाद अधिनियम, 1947’ की विभिन्न धाराओं (जैसे 25F और 25N) का उल्लंघन है। “जो बाद में आया, पहले जाएगा” (LIFO) जैसे बुनियादी श्रम सिद्धांतों की अनदेखी की जा रही है। आगे उन्होने बताया की बिना सुरक्षात्मक पहलू एवं शेष बचे हुये मजदूरों के कार्यभार का मूल्यांकन किए हुये, 40% कर्मचारियों की अचानक कमी से संयंत्र के परिचालन और कार्यस्थल की सुरक्षा की जिम्मेवारी किनकी होगी यह भी स्पष्ट होनी चाहिए । संघ ने अपने पत्र में ‘सेल बनाम नेशनल यूनियन वाटरफ्रंट वर्कर्स’ जैसे सर्वोच्च न्यायालय के ऐतिहासिक निर्णयों का हवाला देते हुए बताया कि सार्वजनिक उपक्रमों में संविदा श्रमिकों के अधिकारों की रक्षा करना प्रबंधन की जिम्मेदारी है। एक अन्य न्यायिक प्रकरण सचिव, कर्नाटक राज्य बनाम उमादेवी (2006) मामले में न्यायालय ने यह माना है कि राज्य श्रमिकों का शोषण नहीं कर सकता और विधि की उचित प्रक्रिया का पालन किए बिना उन्हें अचानक बर्खास्त भी नहीं कर सकता। जबकि सेल एक सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रम (PSU) के रूप में प्रतिष्ठित उपक्रम है, इस तरह की छंटनी सामाजिक उत्तरदायित्व के सिद्धांतों के खिलाफ है, इससे स्थानीय समुदाय की आर्थिक स्थिति पर भी गहरा आघात लगेगा। यदि शुरुआती दिनों से देखें तो सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों की स्थापना का प्राथमिक उदेश्य रोजगार सृजन करना और क्षेत्र के सामाजिक आर्थिक ऊथान को सुनिश्चित करना था । परंतु आज कुछ और ही हो रहा है ।

 

संघ ने प्रबंधन को सुझाव दिया है कि कटौती के लक्ष्य को तत्काल स्थगित किया जाए। तथा छंटनी के बजाय श्रमिकों के लिए ‘पुनकौशल प्रशिक्षण’ (Reskilling) के विकल्प तलाशे जाएं । प्रबंधन से अपील की गई है कि वह एक ‘आदर्श नियोक्ता’ की भांति व्यवहार करे और औ‌द्योगिक शांति व श्रमिक सुरक्षा को प्राथमिकता देते हुए कटौती करने के निर्णय पर तत्काल पुनर्विचार करे।

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