डिब्बा दूध को मां के दूध जैसा दावा करना जुर्म

अगस्त माह का पहला सप्ताह ‘विश्व स्तनपान सप्ताह’ के रूप में मनाया जा रहा है। छत्तीसगढ़ की राजधानी में जागरूकता फैलाने के लिए वेबिनार में का आयोजन किया गया, जिसमें विशेषज्ञों ने चेताया कि बाजार में मिलने वाले डब्बा बंद शिशु आहार को मां के दूध जितना पोषक होने का दावा करना, उसका प्रचार प्रसार करना और नर्सिंग होम या अस्पताल में मां के सामने बच्चे को ऐसा आहार देना कानूनन जुर्म है।
बच्चे को स्वस्थ रखने शुरुआती छह माह तक मां का दूध ही पिलाएं। प्रसूता और शिशुवती महिलाओं के बीच स्तनपान को बढ़ावा देने के लिए, शिशुओं और छोटे बच्चों को कुपोषण से बचाने के साथ ही शिशु मृत्यु दर में कमी लाने के मकसद से वेबिनार का आयोजन हुआ। स्वास्थ्य और महिला एवं बाल विकास विभाग के साथ ही यूनिसेफ के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित वेबिनार में कई अहम जानकारी दी गई।
 वेबिनार में यूनिसेफ के जाब जकारिया ने कहा कि मां का दूध शिशु को कुपोषण, डायरिया, निमोनिया जैसे कई प्रकार की बीमारियों से बचाता है। बच्चों का मानसिक विकास बेहतर होता है। ऐसे बच्चों कोे व्यस्क होने पर मोटापे और मधुमेह की समस्या होने की आशंका कम होती महिला एवं बाल विकास विभाग के सुनील शर्मा ने कहा कि माताओं को परिवार, कार्य स्थल, अस्पताल और समाज से सहारे की जरूरत है।
शासकीय नर्सिंग कालेज की सहायक प्रध्यापक और प्रशिक्षक सपना ठाकुर ने कहा कि डिब्बा बंद को मां के दूध जैसा होने का दावा करना, एक तरह से अपराध है। बच्चे को स्वस्थ रखने शुरुआती छह माह तक मां का दूध ही पिलाएं।
स्वास्थ्य विभाग के राज्य कार्यक्रम अधिकारी यू.आर. भगत ने बताया कि राज्य में संस्थागत प्रसव 90 प्रतिशत है, लेकिन जन्म के एक घंटे के अंदर शिशु को स्तनपान कराने का प्रतिशत 47 प्रतिशत ही है। यूनिसेफ के अभिषेक ने बताया कि जन्म के एक घंटे के अंदर नवजात को मां का दूध पिलाना जरूरी है। छह महीने बाद मां के दूध के साथ बाहरी आहार दिया जा सकता है।
वेबिनार में यूनिसेफ के डाक्टर कुणाल पवार के साथ ही महेन्द्र समेत अन्य विशेषज्ञों ने स्तनपान के महत्व पर महत्वपूर्ण जानकारी साझा की।

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