



ईरान के सर्वोच्च नेता अयातुल्लाह अली खामेनेई की मौत के बाद पश्चिम एशिया में तनाव बढ़ गया है। इस बीच, उत्तर प्रदेश का किंटूर गांव वैश्विक चर्चा में है।


ईरान के सर्वोच्च नेता अयातुल्लाह अली खामेनेई की अमेरिका और इजरायल की संयुक्त कार्रवाई में मौत के बाद पश्चिम एशिया में हालात तनावपूर्ण हैं।
इस बड़े घटनाक्रम के बीच उत्तर प्रदेश का एक छोटा सा गांव किंटूर अचानक वैश्विक चर्चा में आ गया है। बाराबंकी जिले में स्थित यह गांव ईरान की धार्मिक सत्ता से गहरे ऐतिहासिक रिश्ते रखता है।
किंटूर को लंबे समय से शिया धार्मिक शिक्षा का केंद्र माना जाता रहा है। यह गांव ईरान की इस्लामी क्रांति के नेता अयातुल्लाह रूहोल्लाह मुसावी खुमैनी के पूर्वजों का पैतृक स्थान है। खुमैनी को 1979 की इस्लामी क्रांति का मुख्य चेहरा और ईरान के इस्लामी गणराज्य का संस्थापक माना जाता है।
किंटूर गांव सैयद अहमद मुसावी का जन्मस्थान था, जो खुमैनी के दादा थे। उनका जन्म 19वीं सदी की शुरुआत में हुआ था। बाद में वे पढ़ाई के लिए इराक के नजफ शहर गए, जो शिया शिक्षा का बड़ा केंद्र है। साल 1834 में वे ईरान के खुमैन शहर में जाकर बस गए।
यहीं से उनके परिवार की जड़ें ईरान में मजबूत हुईं और आगे चलकर यही परिवार देश की सर्वोच्च धार्मिक सत्ता तक पहुंचा। सैयद अहमद मुसावी अपने नाम के साथ ‘हिंदी’ शब्द इस्तेमाल करते थे, जो उनके भारतीय मूल को दर्शाता था। ईरानी रिकॉर्ड में भी इसका उल्लेख मिलता है।
अयातुल्लाह रूहोल्लाह मुसावी खुमैनी ने 1979 में शाह मोहम्मद रजा पहलवी की सत्ता को खत्म कर इस्लामी गणराज्य की स्थापना की। इसके बाद वे ईरान के पहले सर्वोच्च नेता बने। उन्होंने देश की राजनीति, विदेश नीति और धार्मिक व्यवस्था को पूरी तरह बदल दिया।
उनके समर्थक उन्हें विदेशी प्रभाव के खिलाफ खड़े होने वाला आध्यात्मिक नेता मानते थे, जबकि आलोचक उन्हें सख्त धार्मिक शासन लागू करने वाला नेता बताते हैं। 1989 में उनकी मौत के बाद अयातुल्लाह अली खामेनेई ईरान के सर्वोच्च नेता बने और उन्होंने अपने पूर्ववर्ती से भी लंबा शासन किया।
खामेनेई की मौत के बाद ईरान के भविष्य को लेकर सवाल खड़े हो गए हैं। देश की 88 सदस्यीय ‘असेंबली ऑफ एक्सपर्ट्स’ नए सर्वोच्च नेता का चयन करेगी। इस संस्था में ज्यादातर कट्टरपंथी धर्मगुरु शामिल हैं।
हालांकि अभी तक कोई स्पष्ट उत्तराधिकारी सामने नहीं आया है। ऐसे में सत्ता का संतुलन काफी हद तक रिवोल्यूशनरी गार्ड जैसे ताकतवर संस्थानों पर निर्भर करेगा, जिन्होंने पहले भी सख्ती से सत्ता को बनाए रखा है।
इस बीच अमेरिकी राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप ने फरवरी में बमबारी के दौरान ईरान की जनता से अपनी सरकार संभालने की अपील की थी। अब आगे क्या होगा, यह ईरान की आंतरिक राजनीति और ताकतवर सुरक्षा ढांचे की भूमिका पर निर्भर करेगा।
