



बस्तर: छत्तीसगढ़ सरकार बस्तर की सांस्कृतिक धरोहरों को सहेजने और आदिवासियों की लोक संस्कृति और परंपराओं को प्रदर्शित करने के लिए बस्तर पंडुम का आयोजन कर रही है. ब्लॉक, जिला और संभाग स्तर पर होने वाले बस्तर पंडुम की शुरुआत 12 मार्च से जनपद स्तर पर हो गई है. यह कार्यक्रम 3 अप्रैल तक चलेगा. इस कार्यक्रम को लेकर स्थानीय युवाओं में काफी उत्साह देखने को मिल रहा है. लेकिन सर्व आदिवासी समाज ने बस्तर पंडुम का विरोध किया है. आदिवासी समाज ने बस्तर संभाग आयुक्त को ज्ञापन सौंपकर सरकारी पंडुम में गांव की देवी देवताओं को शामिल नहीं किए जाने की भी मांग की है.


सर्व आदिवासी समाज की माने तो बस्तर पंडुम के माध्यम से आदिवासियों की आस्था के साथ खिलवाड़ किया जा रहा है. उनके रीति -रिवाज से छेड़छाड़ किया जा रहा है. सर्व आदिवासी समाज के संभागीय अध्यक्ष प्रकाश ठाकुर बताते हैं कि बस्तर में पंडुम का अलग महत्व है. आदिवासी परंपरा के अनुसार पंडुम हर ऋतु के आधार पर मनाया जाता है. सभी पंडुम (त्यौहार) को मनाने की एक विधि होती है. जिसमें गांव के देवी देवता भी शामिल होते हैं.
सर्व आदिवासी समाज के अध्यक्ष ने बताया कि हर ऋतु में जो भी फसल उगाते हैं उनका एक निश्चित समय रहता है. इस फसल को अपने गांव के कुल देवी- देवताओं को भोग लगाने के बाद ही उसे ग्रहण किया जाता है. इसे ही पंडुम कहा जाता है.