बलौदाबाजार में स्कूल भवन की मांग ने लिया उग्र रूप, ग्रामीणों ने 6 अधिकारी-कर्मचारी 2 घंटे तक बनाया बंधक।

शिक्षा जैसी बुनियादी जरूरत को लेकर वर्षों से चली आ रही अनदेखी आक्रोश में बदल गई. पलारी ब्लॉक के ग्राम तमोरी में जर्जर स्कूल भवन और नए भवन के निर्माण की मांग को लेकर ग्रामीणों ने SIR सुनवाई के लिए गांव पहुंचे अधिकारियों के दल को लगभग दो घंटे तक बंधक बना लिया. ग्रामीणों ने अधिकारियों को उसी जर्जर स्कूल भवन के भीतर रोककर बाहर से ताला लगा दिया और स्पष्ट कहा कि जब तक ठोस आश्वासन नहीं मिलेगा, तब तक किसी को बाहर नहीं जाने दिया जाएगा.

ग्राम तमोरी में स्कूल भवन की जर्जर स्थिति कोई नई बात नहीं है. ग्रामीणों का कहना है कि वर्षों से वे इस समस्या को लेकर शिक्षा विभाग और प्रशासन के चक्कर लगा रहे हैं. कई बार आवेदन दिए गए, ज्ञापन सौंपे गए, जनप्रतिनिधियों से गुहार लगाई गई, लेकिन हर बार सिर्फ आश्वासन ही मिला. भवन की हालत दिन-ब-दिन खराब होती गई, लेकिन नए भवन के निर्माण की दिशा में कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया. इसी बीच SIR (स्कूल इन्फ्रास्ट्रक्चर रिव्यू) की सुनवाई के लिए जनपद पंचायत के अधिकारी एमके कुजुर के नेतृत्व में एक दल गांव पहुंचा. दल में सहायक अभियंता गुलशन कुमार गायकवाड़, दो शिक्षक और एक रोजगार सहायक शामिल थे. कुल मिलाकर 6 अधिकारी-कर्मचारी निरीक्षण और सुनवाई के लिए पहुंचे थे. ग्रामीणों को उम्मीद थी कि इस बार शायद कोई ठोस निर्णय सामने आएगा.

ग्रामीणों का आरोप है कि जिस स्कूल भवन में बच्चे पढ़ने को मजबूर हैं, उसकी स्थिति बेहद खतरनाक है. दीवारों में दरारें हैं, छत से प्लास्टर झड़ रहा है और बारिश के मौसम में पानी टपकता है. अभिभावकों को हमेशा यह डर बना रहता है कि कहीं कोई बड़ा हादसा न हो जाए. जिला शिक्षा अधिकारी पहले ही कह चुके हैं वर्तमान भवन बेहद कमजोर है और इसे ध्वस्त करना जरूरी है. अधिकारियों की ओर से यह भी कहा गया था कि भवन कभी भी गिर सकता है और बच्चों की जान को खतरा हो सकता है. ग्रामीणों का कहना है कि भवन तोड़ने का आदेश तो दे दिया गया, लेकिन यह नहीं बताया गया कि नए भवन का निर्माण कब होगा और बच्चे कहां पढ़ेंगे. यही असमंजस और असुरक्षा की भावना ग्रामीणों के गुस्से का मुख्य कारण बनी.

सुनवाई के दौरान ग्रामीणों ने अधिकारियों के सामने अपनी बात रखी और नए स्कूल भवन के निर्माण की समय सीमा पूछी. अधिकारियों की ओर से जब संतोषजनक जवाब नहीं मिला औरऔर वही पुराना आश्वासन दोहराया गया, तो माहौल गरमाने लगा. इसी दौरान जिला पंचायत सदस्य और ब्लॉक कांग्रेस कमेटी अध्यक्ष रवि बंजारे भी ग्रामीणों के समर्थन में सामने आए. उन्होंने कहा कि यह मुद्दा केवल एक भवन का नहीं, बल्कि बच्चों के भविष्य और उनकी सुरक्षा का है. उन्होंने आरोप लगाया कि प्रशासन सिर्फ कागजी कार्रवाई तक सीमित रह गया है. ग्रामीणोंके समर्थन में सामने आए. उन्होंने कहा कि यह मुद्दा केवल एक भवन का नहीं, बल्कि बच्चों के भविष्य और उनकी सुरक्षा का है. उन्होंने आरोप लगाया कि प्रशासन सिर्फ कागजी कार्रवाई तक सीमित रह गया है. ग्रामीणों का आक्रोश धीरे-धीरे उग्र रूप लेता गया और उन्होंने अधिकारियों को स्कूल भवन के अंदर ही रोक लिया. बाहर से ताला लगा दिया गया और साफ कह दिया गया कि जब तक नए भवन को लेकर ठोस और लिखित आश्वासन नहीं मिलेगा, तब तक किसी को छोड़ा नहीं जाएगा.

करीब दो घंटे तक 6 अधिकारी-कर्मचारी उसी जर्जर भवन के भीतर बंधक रहे. बाहर ग्रामीणों की भीड़ जुटी रही और लगातार नारेबाजी होती रही. ग्रामीणों का कहना था कि अगर अधिकारी खुद इस भवन में बैठने से डरते हैं, तो वे अपने बच्चों को यहां कैसे भेजें. इस दौरान गांव में तनाव की स्थिति बनी रही. हालांकि किसी प्रकार की मारपीट या हिंसा की सूचना नहीं है, लेकिन हालात बेहद संवेदनशील हो गए थे. प्रशासनिक अमला भी स्थिति पर नजर बनाए हुए था.

ग्रामीणों और रवि बंजारे का कहना है कि यह कदम उन्होंने मजबूरी में उठाया. इस मुद्दे को लेकर कई बार अधिकारियों और विभागों के कार्यालयों का चक्कर लगा चुके हैं. हर बार फाइल आगे बढ़ने की बात कही जाती है, कभी बजट का हवाला दिया जाता है, तो कभी अगली स्वीकृति का. उन्होंने कहा कि वर्षों से यही सिलसिला चल रहा है. अगर शांतिपूर्ण तरीके से बात बनती, तो किसी को इस तरह का कदम उठाने की जरूरत नहीं पड़ती. लेकिन जब बच्चों की सुरक्षा दांव पर लग जाए और प्रशासन सिर्फ कागजों में समाधान ढूंढता रहे, तो ग्रामीणों का धैर्य जवाब दे जाता है.

हालात की गंभीरता को देखते हुए जिला शिक्षा अधिकारी संजय गुहे की ओर से स्पष्ट आश्वासन दिया गया. ग्रामीणों को बताया गया कि नए वित्तीय वर्ष, यानी अप्रैल से स्कूल भवन के निर्माण की प्रक्रिया शुरू की जाएगी. इसके लिए प्रस्ताव और बजट की कार्यवाही की जा रही है. यह आश्वासन मिलने के बाद ग्रामीणों ने अधिकारियों को छोड़ा. हालांकि ग्रामीणों ने यह भी साफ कर दिया कि यदि तय समय में काम शुरू नहीं हुआ, तो वे दोबारा आंदोलन करेंगे और इस बार और कड़ा रुख अपनाया जाएगा.

इस पूरे घटनाक्रम ने प्रशासन की कार्यशैली पर कई सवाल खड़े कर दिए हैं. अगर भवन वाकई खतरनाक स्थिति में है और इसे ध्वस्त करना जरूरी है, तो बच्चों की पढ़ाई के लिए वैकल्पिक व्यवस्था क्यों नहीं की गई. नए भवन के निर्माण की स्पष्ट समय सीमा पहले क्यों तय नहीं की गई. ग्रामीणों का कहना है कि प्रशासनिक तंत्र अक्सर ग्रामीण इलाकों की समस्याओं को गंभीरता से नहीं लेता. जब तक मामला उग्र रूप नहीं लेता, तब तक फाइलें दफ्तरों में धूल खाती रहती हैं.

तमोरी का यह मामला केवल एक गांव तक सीमित नहीं है. जिले के कई ग्रामीण इलाकों में स्कूल भवनों की हालत खराब है. कहीं छत टपक रही है, कहीं दीवारें जर्जर हैं. बावजूद इसके बच्चे जान जोखिम में डालकर पढ़ने को मजबूर हैं. ग्रामीणों का कहना है कि शिक्षा को प्राथमिकता देने की बातें तो बहुत होती हैं, लेकिन जमीनी हकीकत इससे अलग है. यदि समय रहते स्कूलों की मरम्मत और नए भवनों का निर्माण नहीं किया गया, तो किसी बड़े हादसे की आशंका से इनकार नहीं किया जा सकता.

 

 

 

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