



छत्तीसगढ़ में आयुष्मान भारत योजना के तहत इलाज कराने वाले मरीजों की संख्या लगातार बढ़ रही है, लेकिन इसके विपरीत अस्पतालों को मिलने वाला भुगतान समय पर नहीं हो पा रहा है।

वर्तमान में निजी अस्पतालों का करीब 2100 करोड़ रुपये का क्लेम लंबित है। इसमें लगभग 600 करोड़ रुपये पिछले तीन माह के हैं, जबकि करीब 1500 करोड़ रुपये कांग्रेस शासनकाल के दौरान के बताए जा रहे हैं।
भुगतान में देरी से निजी अस्पतालों के साथ-साथ सरकारी अस्पताल भी प्रभावित हो रहे हैं। डीकेएस सुपरस्पेशिलिटी अस्पताल का भी करीब 33 करोड़ रुपये का भुगतान अटका हुआ है। इसमें वर्ष 2024-25 के 19 करोड़ और वर्ष 2025-26 के 14 करोड़ रुपये शामिल हैं।
भुगतान नहीं मिलने के कारण डीकेएस में दवाइयों की खरीद, जांच सुविधाओं और अन्य आवश्यक सेवाओं के संचालन में परेशानी आ रही है। प्रदेश में आयुष्मान योजना के तहत 606 निजी अस्पताल पंजीबद्ध हैं। योजना के अंतर्गत जितने मरीज सरकारी अस्पतालों में इलाज कराते हैं, लगभग उतने ही निजी अस्पतालों का रुख करते हैं।
स्वास्थ्य विभाग हर साल औसतन 2500 करोड़ रुपये गरीब मरीजों के इलाज पर निजी अस्पतालों को भुगतान करता है। इसके बावजूद हर चार-पांच माह में क्लेम अटकना सामान्य हो गया है।
ज्यादा संकट छोटे और मझोले निजी अस्पतालों पर
सबसे ज्यादा संकट छोटे और मझोले निजी अस्पतालों पर है। कई अस्पताल प्रबंधकों ने लोन लेकर संस्थान शुरू किए हैं और अब ईएमआई चुकाने में परेशानी हो रही है। मजबूरी में राजधानी समेत प्रदेश के कई अस्पतालों ने आयुष्मान योजना के तहत निश्शुल्क इलाज सीमित कर दिया है, जिससे गरीब मरीजों को दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा है।
निजी अस्पताल संचालकों का कहना है कि यह समस्या हर साल दोहराई जाती है। हॉस्पिटल बोर्ड के चेयरमैन डॉ. सुरेन्द्र शुक्ला स्वास्थ्य विभाग के अधिकारियों और मंत्री श्याम बिहारी जायसवाल से कई बार मुलाकात कर स्थायी समाधान की मांग कर चुके हैं, लेकिन अब तक कोई ठोस व्यवस्था नहीं बन पाई है।
