



मुंबई: महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव में करारी हार के बाद उद्धव सेना भंवर में फंसी है। अब सारा दारोमदार निकाय चुनाव और बीएमसी चुनाव पर टिका है। इससे पहले पार्टी के एक तबका महाविकास अघाड़ी से बाहर आने और हार्डकोर हिंदुत्व की ओर लौटने की वकालत कर रहा है। चर्चा है कि बीएमसी चुनाव से पहले उद्धव ठाकरे एक बार फिर हिंदुत्व वाले राह पर लौटने को तैयार हैं। 6 दिसंबर को पार्टी के नेता एमएलसी मिलिंद नार्वेकर ने एक पोस्ट में बाबरी मस्जिद विध्वंस का जश्न मनाया। उन्होंने बाला साहेब की तस्वीर के साथ उद्धव ठाकरे और आदित्य ठाकरे के फोटो भी लगे हैं। यूबीटी नेता के इस पोस्ट पर बवाल हुआ और महाराष्ट्र में सपा नेता उद्धव ठाकरे ने महाविकास अघाड़ी से बाहर होने का ऐलान कर दिया।

क्यों दोबारा पकड़ रहे हिंदुत्व का दामन
विधानसभा चुनाव में उद्धव ठाकरे की यूबीटी महाराष्ट्र के दूसरे जिलों में हारी ही, मुंबई में भी पार्टी की बुरी पराजय हुई। मुंबई में 10 सीटों को जिताने का श्रेय राज ठाकरे के मनसे ने लूट लिया। अगर महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना चुनाव मैदान में नहीं होती तो हालात और बुरे ही होते। ‘बंटेंगे तो कटेंगे’, ‘एक हैं तो सेफ हैं’ के नारे और अघाड़ी की धर्मनिरपेक्षता के कारण उद्धव सेना अपने प्रतिद्वंद्वी एकनाथ शिंदे की आधी तक नहीं पहुंच सकी। शिंदे सेना को 57 और उद्धव गुट को 20 सीटें मिलीं। पार्टी के पुराने कार्यकर्ताओं का मानना है कि बाल ठाकरे के हिंदुत्व को छोड़ने के कारण पार्टी को हार का सामना करना पड़ा। अघाड़ी के साथ होने से मुस्लिम वोटर तो उद्धव के पक्ष में आए मगर कोर शिवसैनिकों ने एकनाथ शिंदे का समर्थन किया। अगर बीएमसी चुनाव में उद्धव सेना को झटका लगा तो पार्टी के अस्तित्व पर संकट के बादल छा जाएंगे, यह तय है।
बाल ठाकरे के उत्तराधिकार के लिए हिंदुत्व जरूरी
विधानसभा चुनाव के दौरान महाविकास अघाड़ी को मुस्लिम संगठनों ने समर्थन का ऐलान किया था। इसके बाद महायुति की ओर से उद्धव ठाकरे के बयान ढूंढकर निकाले गए, जिसमें उन्होंने कथित तौर पर औरंगजेब की तारीफ की थी। इसके अलावा आदित्य ठाकरे का मुस्लिम प्रेम सोशल मीडिया में वायरल हुआ। यह ठाकरे परिवार की छवि से उलट थी। बाला साहेब ठाकरे अपने कट्टर हिंदुत्व के लिए ताउम्र जाने जाते रहे। मुंबई दंगों और बाबरी मस्जिद विध्वंस का उनका बयान हिंदूवादी संगठन आज भी शान से सुनते-सुनाते हैं। मुंबईकरों को बाल ठाकरे की यह अदा काफी पसंद आई। इस छवि के कारण सबसे पहले शिवसेना ने बीएमसी चुनाव में बड़ी जीत हासिल की और 30 साल तक दबदबा बनाए रखा। अब जब पार्टी के दो टुकड़े हो चुके हैं और बाल के उत्तराधिकार पर शिंदे सेना भी दावा कर रही है। अगर बीएमसी चुनाव में उद्धव चूके तो उनकी राजनीति का अंत तय है।